महेश कुमार कुलदीप की कुछ चुनिंदा गजलें

Posted By: Abhishek Sharma

Date:

Share

हिंदी ग़ज़ल की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो शब्दों से नहीं, संवेदनाओं से लिखते हैं — महेश कुमार कुलदीप उन्हीं में से एक हैं। उनकी ग़ज़लें मनुष्य के भीतर के अनुभवों, रिश्तों, संघर्षों और आत्म-संवाद की गहराइयों को बड़ी सहजता से उकेरती हैं।
हर शेर एक सच्चाई, हर मिसरा एक अनुभव और हर ग़ज़ल एक जीवन-दर्शन बन जाती है।

महेश कुमार कुलदीप न केवल एक प्रखर रचनाकार हैं, बल्कि ग़ज़ल लेखन के शिक्षक भी हैं। अनेक नवोदित कवियों ने उनसे ग़ज़ल लिखने की बारीकियाँ सीखीं और अपनी पहचान बनाई। यदि आप भी उनसे संवाद करना चाहते हैं, तो अंत में दिए संपर्क सूत्रों से संपर्क कर सकते हैं।

चुनिन्दा ग़ज़लें

धीरे-धीरे भूल रहे हैं

धीरे-धीरे भूल रहे हैं
भूलने वाले भूल रहे हैं

जिसको सबके बाद था भूलना
सबसे पहले भूल रहे हैं

रोज़ नए झगड़े कर-कर के
पिछले झगड़े भूल रहे हैं

किस रस्ते था भूलना उसको
किस रस्ते से भूल रहे हैं

ना-मुमकिन है तुम्हें भुलाना
कहने वाले भूल रहे हैं

नए दौर का वो आलम है
बच्चे मेले भूल रहे हैं

भूलने और याद रखने के इस चक्र में कवि ने रिश्तों की नश्वरता और बदलते समय की विडंबना को खूबसूरती से बांधा है।

2.

चलो ये मान लिया हम उदास रहते हैं

चलो ये मान लिया हम उदास रहते हैं
इसी बहाने मगर ख़ुद के पास रहते हैं

हमारे दिल को अमूमन वही दुखाते हैं
हमारे दिल के अमूमन जो पास रहते हैं

हमारे आँसू हमें ख़ुद ही पोंछने होंगे
कि अब जहाँ में कहाँ ग़म-शनास रहते हैं

हमारे अपनों के बारे में क्या बताएँ हम
हमारी देख तरक़्क़ी उदास रहते हैं

लिबास देख किसी से न दोस्ती करना
कि सस्ते आदमी महँगे लिबास रहते हैं

ख़ुदा को मानने वालों से पूछते हैं हम
अगर ख़ुदा है तो क्यों महव-ए-यास रहते हैं

ये दुनिया ताश के पत्तों के खेल जैसी है
तमाम इक्के अमीरों के पास रहते हैं

ग़ज़ल में सामाजिक व्यंग्य, आत्मचिंतन और यथार्थ की तल्ख़ी एक साथ चलती है। कुलदीप जी का यह अंदाज़ उन्हें भीड़ में अलग करता है।


3.

तूफ़ानों के बीच खड़ा हूँ

तूफ़ानों के बीच खड़ा हूँ
इंसानों के बीच खड़ा हूँ

दीवानों के बीच खड़ा हूँ
सुल्तानों के बीच खड़ा हूँ

गर्दन मेरी उठेगी कैसे
अहसानों के बीच खड़ा हूँ

अपने घर में मेहमां बनकर
मेहमानों के बीच खड़ा हूँ

दुनिया भर का शोर दबाकर
वीरानों के बीच खड़ा हूँ

पागल हूँ मैं लाभ कमाने
नुकसानों के बीच खड़ा हूँ

यहाँ कवि का स्वर जीवन के संघर्षों के बीच आत्मसम्मान और सच्चाई के पक्ष में अडिग खड़ा दिखाई देता है।

कुछ तेरी कुछ मेरी बातें करनी हैं

कुछ तेरी कुछ मेरी बातें करनी हैं
तुझसे मिलकर अपनी बातें करनी हैं

इस बार ज़रा फ़ुर्सत से मिलने आना
अगली पिछली सारी बातें करनी हैं

तेरी ख़ुशियाँ सबसे अव्वल हैं जानां
तू ही बतला कैसी बातें करनी हैं

दुनिया को बेहतर बतलाने का मतलब
कड़वे फल की मीठी बातें करनी हैं

दुनिया-दारी ने इतना तो सिखलाया
किससे आख़िर कैसी बातें करनी हैं

भारी लोगों से मैं मिलने निकला हूँ
मुझको उनसे हल्की बातें करनी हैं

यह ग़ज़ल रिश्तों में संवाद की सुंदरता और जीवन की व्यस्तता में खोती आत्मीयता की कोमल झलक प्रस्तुत करती है।

सबकी ऐसी एक कहानी होती है

सबकी ऐसी एक कहानी होती है
जीवन भर का दाना-पानी होती है

मुझसे बिछड़कर मरने को जो कहता था
अब भी ज़िंदा है हैरानी होती है

वो जो बिना तुम्हारे गुज़रती है
ज़ीस्त सज़ा-ए-कालापानी होती है

ऐतबार की चादर फटती है पहले
रिश्तों में जब खींचा-तानी होती है

दीवानों के आँसू सस्ते मत जानो
इक आँसू में इक तुग़यानी होती है

दोहरी ज़िम्मेदारी है हम फूलों पर
खिलना और दुनिया महकानी होती है

इश्क़ में बस आँखों की चलती है ‘कुलदीप’
बात इशारे में समझानी होती है

यह ग़ज़ल प्रेम, विश्वास और मानवीय संवेदना का उत्कृष्ट उदाहरण है — कुलदीप जी की लेखनी की परिपक्वता यहाँ पूर्ण रूप में झलकती है।


लेखक परिचय : महेश कुमार कुलदीप

  • पिता – श्री मांगी लाल कुलदीप

  • माता – श्रीमती मनभरी देवी

  • जन्मतिथि – 09 जनवरी, 1980

  • जन्मस्थान – ग्राम अमरसर, जिला जयपुर (राजस्थान) – 303601

  • शैक्षणिक योग्यता – बी.एड., एम.ए. (हिंदी साहित्य)

  • संप्रति – वरिष्ठ शिक्षक (हिंदी)

  • प्रकाशित कृतियाँकागज़ पर ज़िंदगी (काव्य संग्रह)

  • लेखन विधाएँ – ग़ज़ल, गीत, कविता, दोहा, कहानी आदि

  • प्रकाशन – विभिन्न साहित्यिक एवं दैनिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन

  • संपर्क
    प्लॉट नं. 6 (पश्चिम), श्याम नगर, बैनाड़ रोड, जयपुर, राजस्थान – 302012
    📞 मोबाइल: 9079937636
    📧 ईमेल: mkkuldeep.mahi@gmail.com

यदि आप उनसे संपर्क करना चाहते हैं, ग़ज़ल लेखन सीखना चाहते हैं या साहित्यिक संवाद स्थापित करना चाहते हैं —
महेश कुमार कुलदीप सदैव खुले दिल से अपने अनुभव साझा करते हैं।
उन्होंने अनेक युवा कवियों को ग़ज़ल की बारीकियों से परिचित कराया है — और यही उनका सबसे बड़ा सम्मान है।


🕊️ समापन

महेश कुमार कुलदीप की ग़ज़लें केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों की सजीव अभिव्यक्ति हैं।
उनकी लेखनी पाठक को सोचने, महसूस करने और भीतर झाँकने पर विवश करती है।
वो ग़ज़ल को “भाव और बुद्धि के बीच का पुल” मानते हैं — और उनकी रचनाएँ इस पुल पर चलने का अद्भुत अनुभव कराती हैं।


नई प्रकाशित कृति — ग़ज़ल संग्रह: और वो भी तुम

हाल ही में महेश कुमार कुलदीप की एक नई कृति प्रकाशित हुई है — और वो भी तुम (ग़ज़ल संग्रह)। यह संग्रह उनकी सूक्ष्म भाव-जागरूकता और ग़ज़ल शैली की परिपक्वता का उत्कृष्ट संकलन है। यदि आप ग़ज़ल और आधुनिक हिंदी काव्य से प्रेम करते हैं तो यह पुस्तक आपकी शैल्फ़ में जगह बनाने योग्य है।

अगर आप आज ही यह पुस्तक ख़रीदना चाहते हैं, यदि आपको ग़ज़लों की सूक्ष्मता भाती है और आप महेश कुमार कुलदीप की लेखनी का आनन्द लेना चाहते हैं, तो अभी और वो भी तुम खरीदें — आपके पास दो आसान विकल्प हैं: Flipkart से ऑर्डर करें या सीधे प्रकाशक की साइट से जानकारी व खरीदें। नीचे दिए हुए बटन/लिंक पर क्लिक कर तुरंत खरीदें।